हरियाली महोत्सव

अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्‍वविद्यालय, भोपाल

‘हरियाली महोत्‍सव' 

प्रतिवेदन

                   

दिनांक 01 अगस्‍त, 2019

           पौधा के साथ ली सेल्फी और शपथ

           अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय में हरियाली महोत्सव मनाया गया। शिक्षकों और छात्रों ने वृक्षारोपण कर पौधों के साथ सेल्फी ली। पर्यावरण संतुलन के उद्देश्य से हुये इस कार्यक्रम में सभी प्रतिभागियों ने पौधों की देखभाल और पॉलीथिन का उपयोग नहीं करने की शपथ ली। 
           हिंदी विश्वविद्यालय में गुरुवार को हरियाली महोत्सव के तहत एक अभियान धरती के श्रृंगार का आयोजन हुआ। कार्यक्रम संयोजक प्रो. विजय सिंह ने 1 से 20 अगस्त तक चलने वाले हरियाली महोत्सव की रूपरेखा बताते हुये कहा कि असामान्य वर्षा, बगड़ते मौसम और प्रदूषित पर्यावरण को संतुलित करने के लिये वृक्षों को लगाना समय की मांग है। आयोजन के दौरान विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. बी. भारती ने सभी सदस्यों को पौधा लगाने और अपने परिवार की तरह देखभाल करने के साथ कभी किसी वृक्ष को नुकसान न पहुंचाने और पॉलीथिन का उपयोग नहीं करने की शपथ दिलाई। कार्यक्रम में मौजूद विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो. रामदेव भारद्वाज ने कहा कि भारतीय संस्कृति में हरियाली अमावस्या का विशेष महत्व है। आज के दिन से शुभ काम की शुरूआत होती है। प्रो. भारद्वाज ने बताया कि परम्परा प्रकृति और पर्यावरण का आपस में गहरा संबंध है। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के सभी शिक्षकों, अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ छात्रों ने वृक्षारोपण कर पौधों के साथ सेल्फी ली। इस अवसर पर प्रो. रेखा राय, प्रो. भावना ठाकुर और वित्त अधिकारी श्रीमती ऊषा सरयाम के साथ क्षेत्रीय रहवासियों ने भी सहभागिता की।

                              

                              

दिनांक 02 अगस्‍त, 2019

             आज दिनांक 02.08.19 के हरियाली महोत्सव के दूसरे दिन के कार्यक्रम के तहत् भाषण प्रतियोगिता का आयोजन किया गया जिसका विषय था ‘‘षुद्ध ऑक्सीजन कितना जरुरी है’’ इस कार्यक्रम में विष्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रामदेव भारद्वाज, कुलसचिव, डॉ. बी. भारती इस कार्यक्रम के संयोजक प्रो. विजय सिंह, उपसंयोजक डॉ. भावना ठाकुर प्रो. रेखा रॉय, एवं वित्त अधिकारी सुश्री उषा सरेयाम, समस्त अधिकारी, षिक्षकगण उपस्थित रहे। विषय का महत्व प्रतिपादित करते हुए विद्यार्थियों ने बताया कि ऑक्सीजन जीवन के लिए अनिवार्य घटक है। यह हमारे द्वारा ग्रहण किये भोजन के उपयोग करने में सहायता प्रदान करती है। इसके द्वारा ही हम भोजन में संचित  उर्जा को प्राप्त करने में सक्षम होते हैं।

            छात्रों ने बताया कि जो कार्य पत्‍ती करती है वह कार्य किसी मषीन द्वारा संभव नहीं हैं। जो कार्य पत्‍ती बिना किसी खर्च के करती है, यह पत्‍ती ही प्रकृति के घटकों को ग्रहण कर अपने क्लोरोफिल तथा सूर्य प्रकाष की उपस्थिति में जटिल पदार्थों का निर्माण करती है जैसे कार्बनडाईऑक्साइड, जल, सूर्य का प्रकाष तथा क्लोरोफिल की सहायता से भोज्य पदार्थो का निर्माण करती हैं जो पृथ्वी के असंख्य जीवन का पोषण करते हैं इस प्रकार वृक्ष सूर्य की ऊर्जा को प्रत्येक जीवों में पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य करते हैं।

            पर्यावरण मे षुद्ध ऑक्सीजन की कमी निरंतर हो रही है यदि हमें षुद्ध ऑक्सीजन चाहिये तो वृक्षारोपण को बढ़ावा देना होगा। इस दृष्टि से वृक्ष लगाना अत्यन्त आवष्यक कार्य है।

                              

दिनांक 03 अगस्‍त, 2019

             आज दिनांक 03.08.19 के हरियाली महोत्सव की श्रृंखला में आज के कार्यक्रम के तहत् भाषण प्रतियोगिता का आयोजन पुनः किया गया जिसका विषय था ‘‘वर्षा के पानी को सहेजना हमारी आवष्यकता है’’ इस कार्यक्रम में विष्वविद्यालय के कुलसचिव, डॉ. बी. भारती इस कार्यक्रम के संयोजक प्रो. विजय सिंह, उपसंयोजक डॉ. भावना ठाकुर प्रो. रेखा रॉय,एवं वित्त अधिकारी सुश्री उषा सरेयाम, समस्त अधिकारी, षिक्षकगण उपस्थित हुए। विषय को आगे बढ़ाते हुए सर्वप्रथम मा. कुलसचिव महोदय ने अपने उद्बोधन मे कहा कि यदि वर्तमान समय में पानी को नहीं सहेजा गया तो भविष्य मे स्थिति बहुत भयावह निर्मित हो सकती है इस संदर्भ में उन्‍होंने उत्‍तरप्रदेष सरकार की पहल को स्वागतयोग्य बताया जिसमे कि केबिनेट में आधा गिलास पानी दिया जायेगा। आवष्यकता पड़ने पर और पानी बाद में दिया जायेगा। बड़े-बड़े वैज्ञानिकों ने सागर जल को पीने योग्य बनाने के लिये बहुत प्रयत्न किया किन्तु वह बहुत खर्चीली पद्धति है। वर्षा जल संरक्षण सबसे अच्छा उपाय है हमे बौद्धिक विलास के चोचलेपन से उपर उठ कर स्वयं से ठोस उपाय करने कि आवष्यकता है।

            विद्यार्थियों ने वर्षाजल को संग्रहित करने के बारे में विभिन्न सुझाव दिये, जिसमे बरसात के समय हमे वॉटर हार्वेस्टिंग करना चाहिये इसके साथ-साथ कुओं एवं तलाबों का गहरीकरण करना एवं उन्हें पुनर्जिवित करके भी वर्षाजल को सहेजा जा सकता है। इस तरीके से वर्षाजल सहेजने पर भूजल स्तर मे भी वृद्धि की जा सकती है इस अवसर पर एक विद्यार्थी ने पानी की खेती विषय पर बहुत सुंदर कविता प्रस्तुत कि -

‘‘मै चाहता हूँ मेरी आने वाली पीढ़ी के पास खूब जलराषि हो,

इसलिए मै पानी बनाना चाहता हूँ

मैं जानता हूँ पानी बनाया नही जा सकता

लेकिन बंधान/तलाब तो बनाया जा सकता है।

मैं पानी की खेती करना चाहता हूँ

ताकी वो कई गुना, उगे बूंद की हजार बूंदे लगें।

मैं जानता हूं पानी उगाया नहीं जा सकता

लेकिन पौधे लगाकर पेड़ों को तो उगाया जा सकता है

मैं पीढ़ीयों के लिये पानी छुपाकर रखना चाहता हूं

ताकि उसे कोई चुरा न सके

मैं जानता हूं पानी छुपाया नहीे जा सकता

लेकिन कोई संरचना बनाकर पृथ्वी के पेट मे उतारा जा सकता है

जितना पानी षेष है मै उसे बचाकर रखना चाहता हूं

जैसे चूजों के लिये चिड़िया बचाती है पंखों में

वैसे हि मैं बचाना चाहता हूं।’’

 

               इसके पष्चात हरियाली महोत्सव कार्यक्रम के समन्वयक प्रो. विजय सिंह सर ने बताया कि जब हम वर्षाजल संरक्षण की बात करते है तो सबसे पहले हम जल को श्रेणीबद्ध करना पडे़गा जिसमे पेयजल एवं अन्य निस्तार का जल आते हैं। पृथ्वी पर 71 प्रतिषत भाग जलाच्छादित है षेष 29 प्रतिषत स्थल भाग है किन्तु फिर भी आज सबसे अधिक चिंतन का विषय है कि इसमे से भी 98 प्रतिषत पानी पीने योग्य नहीं है केवल 2 प्रतिषत पानी ही पीने योग्य है। कुल वर्षा मे से भी 86 प्रतिषत वर्षा समुद्र मे होती है और केवल 14 प्रतिषत स्थल भाग मे हो रहीं है, और वर्षा के इस 14 प्रतिषत जल को सहेजने का काम वृक्ष कर रहे हैं यदि 33 प्रतिषत वन क्षेत्र होगा तो इस पानी को सहेजा जा सकता अन्यथा यह नदी, नालो या अन्य किसी माध्यम से भी यदि समुद्र मे पहुंच जाता है तो यह जल पीने योग्य नहीं रह जाता।

                              

दिनांक 05 अगस्‍त, 2019

            आज दिनांक 05.08.19 के हरियाली महोत्सव के चौथे दिन के कार्यक्रम के तहत् भाषण प्रतियोगिता का आयोजन किया गया जिसका विषय था ‘‘वन्य प्राणियों की रक्षा कैसे करें ’’ इस कार्यक्रम में विश्‍वविद्यालय के कुलपति प्रो. रामदेव भारद्वाज, इस कार्यक्रम के संयोजक प्रो. विजय सिंह, प्रो. रेखा रॉय एवं वित्त अधिकारी सुश्री उषा सरेयाम, समस्त अधिकारी, शिक्षकगण उपस्थित रहे।
             इस कार्यक्रम में आज की कड़ी मे चौथे दिवस का कार्यक्रम आयोजित किया गया है जिसमें कार्यक्रम के आंरभ में वन्य प्राणि संरक्षण पर पी.पी.टी. प्रस्तुतिकरण के माध्यम से भारतीय संस्कृति में मनुष्य का स्थान एवं पाश्‍चात्‍य संस्कृति में मनुष्य के स्थान की अवधारणा को बताया है। भारतीय संस्कृति में मनुष्य का स्थान अन्य प्राणियों जितना ही है इसमें बताया गया वन्य प्राणियों का संरक्षण दो प्रकार से हो सकता है; अंतःस्थलीय एवं बाह्यस्थलीय यह क्रमश: प्राकृतिक आवासों मे संरक्षण एवं कृत्रिम आवासों मे संरक्षण प्रदान करना है। संकटापन्न प्रजातियों के लिए विभिन्न परियोजनाएं चलाई जा रहीं है जिनमें सबसे पहले 1972 में वन्य जीव संरक्षण अधिनियम बनाया गया जिसमें राष्ट्रीय उद्यान अभ्यारण एवं संरक्षण क्षेत्र बनाये गये। इसके लिये विश्‍वस्तरीय प्रयास हो रहे हैं जिसमे रेड डेटा बुक में संकटग्रस्त प्रजाति के बारे में जानकारी होती है। संकट के खतरों तथा उपलब्ध मात्रा के आाधार पर विभिन्न प्रजातियों को भिन्न-भिन्न संकट श्रेणियों में रखा जाता है।
            भारत जैवविविधता वाला देश है ‍विश्‍व की समस्त प्रजातियों में से अधिकतम भारत मे पायी जाती हैं। किन्तु धीरे-धीरे यह विविधता कम हो रही है। वन्य प्राणियों के संरक्षण का सबसे अच्छा उपाय है। वनो को विनाश होने से रोकना क्योंकि मनुष्य बहुत खतरनाक तरीके से प्राकृतिक संसाधनों को समाप्त कर रहा है। इसका प्रभाव वन्य प्राणियों पर सबसे अधिक पड़ा है। वर्तमान समय में मनुष्य प्राणियों से प्राप्त वस्तुओं का अधिकाधिक प्रयोग करने लगा है। यदि हमें वन्य प्राणियों को बचाना है तो सबसे पहले हमें इन वस्तुओं का प्रयोग तत्काल बन्द करना होगा। जो जनता की सक्रिय स्वभागीदारी के बिना संभव नही है। सरकार के द्वारा अधिनियम और कानून बनाकर वन्यजीवों की रक्षा में प्रयास किया जा रहा है जिसमें विभिन्न प्रकार की परियोजनाएं संचालित हैं।
            आज का विषय इकोसिस्टम से जुड़ा हुआ है और इस इकोसिस्टम की एक बहुत महत्वपूर्ण कड़ी का तेजी से क्षय हो रहा है। वन्यजीवों के लिये प्रकृति स्वयं व्यवस्था बनायी थी। क्योंकि वे स्वयं अपना आवास नहीं बना सकते थे किन्तु वर्तमान मे मनुष्य उन सब प्राक्रतिक आवासो को समाप्त कर रहा है। प्राकृतिक व्यवस्था मे मनुष्य और प्रकृति के संतुलन में मनुष्य प्रकृति पर हावी होता दिखाई दे रहा है। प्रकृति और मानव में तीन प्रकार के संबंध होते है - अन्तरसंबंध, अन्तरप्रतिक्रिया और अन्तरनिर्भरता। व्यवस्था के हिसाब से मनुष्य को या तो संरक्षण करना चाहिए या विकास करना चाहिए। इस कार्यक्रम के माध्यम से विभिन्न विषयों के विद्याथियों ने इस महत्वपूर्ण विषय को समझा।

                              

दिनांक 06 अगस्‍त, 2019

            ‘‘पर्यावरण को ग्लोबल वार्मिंग और प्रदूषण से कैसे बचायें’’

             हरियाली महोत्सव की श्रृंखला में कार्यक्रम के तहत् भाषण प्रतियोगिता का आयोजन पुनः किया गया जिसका विषय था ‘‘पर्यावरण को ग्लोबल वार्मिंग और प्रदूषण से कैसे बचायें’’ इस कार्यक्रम मे विश्वविद्यालय के कुलसचिव डाॅ. बी. भारती इस कार्यक्रम के संयोजक प्रो. विजय सिंह, उपसंयोजक डाॅ. भावना ठाकुर, प्रो. रेखा राॅय एवं वित्त अधिकारी सुश्री उषा सरेयाम, समस्त अधिकारी, शिक्षकगण उपस्थित हुए। इस विषय को आगे बढ़ाते हुए विद्यार्थियों द्वारा बताया गया कि पृथ्वी पर आने वाली विभिन्न प्रकार की विकिरणों को पृथ्वी वापस करती है। लगातार पृथ्वी पर सूर्य की किरणों को आने और जाने में असंतुलन हो जाता है।
            वैश्विक तापन विभिन्न प्रकार की गैसों co, co2, so2 आदि गैसों का वातावरण में उत्सर्जन होता है जिसके कारण तापमान में वृद्धि होती है। समुद्र की सतह का तापमान 10°c है जबकि पृथ्वी की सतह का तापमान 14°c है चाइना 25% ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करता है जबकि भारत के द्वारा सिर्फ 7% उत्सर्जन होता है। ग्लोबल वार्मिंग सिर्फ एक क्षेत्र विशेष नहीं अपितु पूरे वैश्विक स्तर पर चिंता का विषय हैं। यह वैश्विक तापन समुद्र में भी होगा एवं स्थल में भी होगा। मानव निर्मित घटनायें ग्रीन हाउस गैस ग्लोबल वार्मिंग उत्पन्न करती हैं। प्राकृतिक रूप से भूकंप ज्वालामुखी वैश्विक तापन के लिए जिम्मेदार हैं। तापमान में वृद्धि होने से ग्लेशियर पिघलेगें जिससे समुद्र के जलस्तर में वृद्धि होगीं, बाढ़ आयेगी, सबसे पहले स्टाकहोम में 1972 में पर्यावरण वैश्विक तपन की बात हुई। इसके बाद रियोडी जेनेरियो में 1985 में बात हुई।
            अधिकाधिक वृक्ष लगाने से ऑक्सीजन पैदा होगी जिससे ग्रीन हाउस गैसों का प्रभाव कम होगा। विकासशील देशों की तुलना में विकसित देशों द्वारा ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन अधिक हो रहा है। विकसित देशों में अमेरिका उस संधि से अपने आपका अलग कर लिया जो ग्रीन हाउस एवं कार्बन उत्सर्जन को कम करने की बात करते हैं। उसके बदले में अन्य देशों को अलग में राशि मुहैया कराने की बात करता है।

                              

दिनांक 07 अगस्‍त, 2019

             आज दिनांक 07.08.19 के हरियाली महोत्सव के छटवा दिन के कार्यक्रम के तहत् भाषण प्रतियोगिता का आयोजन किया गया जिसका विषय था ‘‘पॉलिथीन का उपयोग घातक है’’ इस कार्यक्रम में विश्‍वविद्यालय के कुलपति प्रो. रामदेव भारद्वाज, कुलसचिव, डॉ. बी. भारती इस कार्यक्रम के संयोजक प्रो. विजय सिंह, उपसंयोजक डॉ. भावना ठाकुर, प्रो. रेखा रॉय एवं वित्त अधिकारी सुश्री उषा सरेयाम, समस्त अधिकारी, शिक्षकगण उपस्थित रहे। हमारे पर्यावरण में जल,वायु और मिट्टी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते हैं। सन् 1892 मे एक जर्मन वैज्ञानिक के द्वारा प्लास्टिक का अविष्कार किया गया था। जो विभिन्न प्रकार के घातक रासायनिक पदार्थों से मिलकर बना होता है जो एक बार वातावरण मे आ जाने के बाद कभी समाप्त नहीं होता है। वर्तमान समय मे प्लास्टिक का एक रूप हमे पॉलिथीन के रूप मे देखने मिल रहा है। जो हमारे पर्यावरण को बहुत दुष्प्रभावित कर रहा है। आज नदी, नालों, खेतों, समुद्र खाली पड़ी हर जगह पर हमें निस्तारित पॉलिथीन दिखाई पड़ती है।

             मिट्टी मे पॉलिथीन दब जाने से वर्षा का जल पृथ्वी मे नीचें नहीं जा पाता है इसके दो नुकसान होते है एक तो भू-जल स्तर में वृद्धि नहीं हो पाती, दूसरा मिट्टी दलदली होती है अर्थात पॉलिथीन के कारण भूमि की उर्वरा षक्ति घटती है। इसके अलावा यही पॉलिथीन नदी और नालों मे चली जाने से इनका प्रवाह अवरूद्ध होता है जिससे बाढ़ जैसे विकराल समस्या देखने मिल रहीं है जिससे मानव जीवन अस्त व्यस्त हो रहा है। पॉलिथीन हमारे दैनिक जीवन मे आज सबसे अधिक  उपयोग की जाने वाली वस्तु है जिसमे यदि हम गर्म खाद्य पदार्थ लेते है तो यही घातक रसायन हमारी पेट मे चले जाते है जिससे विभिन्न प्रकार की बीमारियां उत्पन्न होती है और यदि हम ये खाद्य पदार्थ पॉलिथीन मे बाहर फेंकते है तो मवेषी इसको खाते है जिससे उनकी मृत्यु तक हो जाती है। समुद्र भी इससे परे नहीं है समुद्र मे भी बहुत सी पॉलिथीन नदियों के माध्यम से बहकर चली जाती है। जिससे समुद्र भी प्रदूषित हो रहा है।

                              

दिनांक 08 अगस्‍त, 2019

             आज दिनांक 08.08.19 के हरियाली महोत्सव के सातवें दिन के कार्यक्रम के तहत् चित्रकला प्रतियोगिता का आयोजन किया गया जिसका विषय था ‘‘पर्यावरण संरक्षण के विभिन्न आयाम’’ इस कार्यक्रम में विष्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रामदेव भारद्वाज, कुलसचिव, डॉ. बी. भारती इस कार्यक्रम के संयोजक प्रो. विजय सिंह, उपसंयोजक डॉ. भावना ठाकुर एवं वित्त अधिकारी सुश्री उषा सरेयाम, समस्त अधिकारी, षिक्षकगण उपस्थित रहे।

              विद्यार्थियों ने चित्रों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण के महत्व को समझाने की कोषिष की। चित्रकला के षिखर पर इटली के लियोनार्डो दा विंसी. का नाम आता है उनके नाम के सामने साइंटिस्ट और पेंटर लिखा होता है। हॉलाकि पेंटिंग कला संकाय का विषय है किंतु एक विशिष्ट विषयवस्तु पर विश्‍व के सभी देष उसे मानने बाध्य हो जायें तो उसे विज्ञान कह सकते है। इन्होने विज्ञान की बात बात चित्र के माध्यम से कहने की कोषिष की थी। इनकी एक विष्व प्रसिद्ध पेंटिंग पर्यावरण संतुलन की और इंगित करती है एवं विश्‍व के सभी देष इस पेंटिंग के बारे में एक जैसी बात कहते हैं।

              उच्‍च तकनीकि कुषल व्यक्ति पर्यावरण को सबसे अधिक नुकसान पहुंचता है। चित्र के माध्यम से अपनी बात को पढ़े लिखे तथा अषिक्षितो तक बहुत सहजता से पहुंचाया जा सकता है क्योंकि चित्र आसानी से हर व्यक्ति की समझ में आ जाते है। विद्यार्थियों ने ग्लोबल वॉर्मिंग, जल संरक्षण, वन संरक्षण एवं पर्यावरण संरक्षण पर चित्रों के माध्यम से अपना संदेष पहुंचाया।

                              

दिनांक 19 अगस्‍त, 2019

            ‘‘भारतीय संस्कृति, हमारे संस्कार और व्यवहार में पर्यावरण’’

            हरियाली महोत्सव की श्रृंखला में आज के कार्यक्रम के तहत् निबंध प्रतियोगिता का आयोजन पुनः किया गया जिसका विषय था ‘‘भारतीय संस्कृति, हमारे संस्कार और व्यवहार में पर्यावरण’’ इस कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के कुलसचिव डाॅ. बी. भारती, प्रो. रेखा राॅय एवं वित्त अधिकारी सुश्री उषा सरेयाम, समस्त अधिकारी, शिक्षकगण उपस्थित हुए। कुलसचिव जी ने विद्यार्थियों का उत्साहवर्धन करते हुए बताया कि किस प्रकार हमारे संस्कारों में पर्यावरण संरक्षण की बात कहीं गई है।
            भारतीय संस्कृति का पर्यावरण से संबंध स्थापित करते हुए हम कह सकते हैंं कि हमारी संस्कृति में पेड़-पौधों की पूजा की जाती है इसलिए हम पेड़-पौधें लगाने पर जोर देते हैंं काटने पर नहीं। भारतीय संस्कृति में प्रत्येक नक्षत्रों एवं ग्रहों के लिए भी एक विशिष्ट पेड़ निर्धारित किया गया हैं, कहीं-कहीं पर उसे नक्षत्र वाटिका के रूप में स्थापित किया गया है। इसके अतिरिक्त कुछ पेड़-पौधे ऐसे हैंं जिनमें वर्ष पर्यन्त जल चढ़ाने का विधान बनाया गया है। जिनमें तुलसी प्रमुख पौधा है। हमारे यहां सर्वविदित है कि प्रत्येक घर में तुलसी का पौधा होना चाहिए।
            इसके अलावा आयुर्वेद विज्ञान प्राचीन भारत का सबसे महत्वपूर्ण विज्ञान है जिसमें शारीरिक व्याधियों से निपटने के लिए पूर्ण रूप से प्रकृति पर निर्भरता दिखाई गई है। प्राचीन काल में ऋषि-मुनि प्रत्येक पौधे के महत्व का समझते थे एवं उनके पंचांग का प्रयोग विभिन्न प्रकार की बीमारियों से मुक्ति के लिए जड़ी-बूटियों के प्रयोग के माध्यम से उपचार बताये गये हैं।

                              

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