रसायन शास्त्र

          हमारे देश में रसायन शास्त्र के ज्ञान की प्राचीन परम्परा हैं। आज हम नाभिकीय रसायन शास्त्र के युग में प्रवेश कर चुके है। रसायन विज्ञान को केंद्रीय विज्ञान या आधारभूत विज्ञान भी कहा जाता है; क्योंकि यह दूसरे विज्ञानों जैसे खगोल विज्ञान, भौतिकी, पदार्थ विज्ञान और भू-विज्ञान को जोड़ता है।
    अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय में रसायन शास्त्र विभाग की स्थापना आधारभूत विज्ञान संकाय के अन्तर्गत शैक्षणिक सत्र 2013-14 में की गई। वर्तमान समय में रसायन शास्त्र विषय का विस्तार लगभग 30 से अधिक शाखाओं में है; जिनमें अध्ययन-अध्यापन कार्य होता है। इन्ही सब बातों को ध्यान में रखकर रसायन शास्त्र के निम्नलिखित पाठ्यक्रमों की रचना की गई हैः
1.    विद्यावारिधि (पी.एच.डी)
2.    विद्यानिधि (एम.फिल)
3.    स्नातकोत्तर (एम.एससी-सेमिस्टर प्रणाली)
4.    स्नातक प्रतिष्ठा (बी.एससी-आनर्स सेमिस्टर प्रणाली)
5.    पत्रोपाधि (डिप्लोमा) खाद्य सुरक्षा और गुणात्मक प्रबंधन
           रसायन शास्त्र के उक्त पाठ्यक्रमों के विषय वस्तु निर्धारण व निश्चित समयावधि उपरान्त नियमित रूप से अद्यतन व उन्नत करने की दृष्टि से विषय विशेषज्ञों की विद्वत परिषद जिसे अध्ययन मंडल के रूप में गठन किया गया है। रसायन शास्त्र विभाग ने शैक्षणिक सत्र 2013-14 में शैक्षणिक कार्य आरम्भ किया। प्रथम सत्र में स्नातक स्तर पर 08 विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया। शनै-शनै यह विभागीय विकास यात्रा आरम्भ हुई, इसके द्वितीय सोपान के रूप में शैक्षणिक सत्र 2016-17 में स्नातकोत्तर स्तर की कक्षाओं का अध्ययन-अध्यापन कार्य आरम्भ हुआ। इस सत्र में 04 विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया। इसके उपरान्त विभाग में स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर पर शैक्षणिक कार्य संपादित किया जा रहा है। वर्तमान में कुल 15 विद्यार्थी रसायन शास्त्र विभाग में अध्ययनरत है। 
    विद्यार्थियों को भली प्रकार से विषय का ज्ञान प्राप्त हो इस दृष्टिकोण से विश्वविद्यालय के केंद्रीय ग्रंथालय में, विभागीय पुस्तकालय में पाठ्यक्रम से संदर्भ पुस्तकों को समृद्ध संग्रह है। जिनका विद्यार्थियों को उनकी आवश्यकतानुसार वितवरण किया जाता है। 
           रसायन शास्त्र विषय की प्रायोगिता एवं विशिष्टता को ध्यान में रखकर सुसज्जति प्रयोगशाला की व्यवस्था है। जिसमें कार्बनिक, अकार्बनिक व भौतिक रसायन पाठ्यक्रमानुसार अभिकर्मक, उपकरण व यंत्र उपलब्ध है। जिनका प्रायोगिक कार्यों में विद्यार्थियों द्वारा शिक्षकों के मार्गदर्शन में प्रयोग किया जाता है। प्रयोगशाला के उन्नयीनिकरण का कार्य प्रगति पर है। 
    विविध आयोजन - 
           किसी भी राष्ट्र के आर्थिक एवं सामाजिक उत्थान में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की महती भूमिका है। मानव जीवन को उन्नत बनाना ही वैज्ञानिक अनुसंधानों एवं विकास कार्यों को मूल उदेश्य होता है। विभागीय विद्यार्थियों को प्रौद्योगिक से होने वाले लाभ से अवगत करवाने एवं प्राचीन भारत में विज्ञान की विशिष्टताओं को दर्शाने के उदेश्य से विभाग द्वारा समय-समय पर विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किये जाते है। 
1.    शैक्षणिक सत्र 2014-15 में विभाग द्वारा दिनांक 12.04.2015 को ‘‘भारतीय वैज्ञानिक चिंतन विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमे नागपुर विश्वविद्यालय के चार विद्वानों ने सहभागिता की तथा अपने शोध कार्यों को संगोष्ठी में प्रस्तुत किया।
2.    अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय, भोपाल एवं हिंदी विज्ञान साहित्य परिषद, भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र, मुंबई के संयुक्त तत्वाधान में दिनांक 09 से 11 नवंबर, 2016 को राष्ट्रीय वैज्ञानिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। जो प्राचीन एवं आधुनिक भारत में विज्ञान एवं ऊर्जा के आयाम विषय पर केंद्रित थी।
    इन तीन दिवसीय संगोष्ठी के अवसर पर विश्वविद्यालय के रसायानशास्त्र विभाग द्वारा प्राचीन भारतीय संस्कृत ग्रंथों में वर्णित विभिन्न उक्तियों, श्लोकों व सूत्रों के आधार पर विज्ञान विषय से संबंधित विविध स्वचलित प्रादर्श (माॅडल) आमंत्रियों, अतिथियों एवं अभ्यागतों के अवलोकनार्थ प्रस्तुत किये गये। जिसमें महान संस्कृत ग्रंथ शिल्परत्न ई.स. 1200 के निम्न श्लोक के आधार पर प्रादर्श का निर्माण किया गया:-
‘‘क्षारेकदल्या मथितेनयुक्ते दिनोषितं पापति मामसंयद।
सम्यक् शितंनाश्मानी चैतिभंगं नचान्य लोहे त्वपितस् कौठं।।

          उपर्युक्त श्लोक के अनुसार यदि केले के छिलके को दिनभर धूप में सुखाकर जलाया जाय और फिर उसकी राख को पानी में मिलाया जाय तो इस प्रकार निर्मित विलयन में जब लोहे के औजरों को गरम करके डुबोते हैं तो सामान्य लोहे के औजारों के अपेक्षा उनकी कार्य क्षमता कई गुना बढ़ जाती है। इस पद्धति से निर्मित विलयन क्षारीय प्रकृति का होता है तथा इसका पीएच मान 12 तक होता है। इसका उद्योगों में उपयोग किया जा सकता है। इस प्रकार अनुपयोगी वस्तु से उपयोगी वस्तु बनाई जा सकती है। 
    इस श्रृंखला में अगस्त संहिता में वर्णित सुभाषित के आधार पर विभिन्न प्रकार के रसायनों के सुमेलित संयोजन से एक विद्युत सेल का निर्माण किया गया है जिसका उपस्थित वैज्ञानिक वृन्द के समक्ष प्रात्येक्षिक किया गया जिसकी सभी ने भूरी-भूरी प्रशंसा की।
    निम्न संस्कृत सुभाषित के आधार पर जब विभिन्न प्राकृतिक उत्पादों को उचित मात्रा में मिलाया जाता है तो उत्तम प्रकार का अभिकर्मक तैयार होता है जिसके द्वारा कठोर से कठोर चमढ़े को भी मृदृ बनाया जा सकता है। 
‘‘मधुमधुकभजापयः सतैल घृतगुडकिववयुतंस कंदलीकं।
यदापि शतसहस्त्रधा विभिन्नतम् भवती मृदु त्रिमिरेवतन्निषकैः
गोदन्त शृग प्रतिवापो मृदृस्तभनम्।।’’

(अर्थात्:- शहद, मुलेठी, बकरी का दूध, तेल, घी, गुड, केले का चूर्ण इत्यादि का मिश्रण लगाने पर कठोर चमड़ा भी मृदु बनता है। यह सिद्ध हुआ है किंतु इसके अतिरिक्त गाय के दाँत, सींग भी मृदु होते हैं।)
वनस्पति गुणाधर्श ग्रंथ, श्री, दा. पदे के अनुसार ककड़ी के रस में व्याप्त गुणधर्मों के बारे में व्याख्यात्मक उल्लेख करते हुए कहते हैं कि जब ककड़ी का रस किसी भी पदार्थ में मिलाया जाता है तो वह पदार्थ में व्याप्त चिकनाहट को न्यून करता है जिसके कारण पदार्थ की बंधन क्षमता में कमी आती है जिसका व्यवसायिक स्तर पर भी  उपयोग किया जा सकता है। अवलोकनार्थियों कि जिज्ञासाओं का भी समाधान किया गया। 
महान गणितज्ञ भास्कराचार्य द्वितीय ई.स. 1117 के प्रसिद्ध ग्रंथ लीलावती की युक्ति के माध्यम से हमें ज्ञात होता है कि प्राचीन समय में भी भास्कराचार्य जी द्वारा अध्ययन-अध्यापन में विभिन्न शैक्षणिक उपकरणों का प्रयोग किया जाता था। इस प्रकार के उपकरण प्रदर्शनी मेें प्रस्तुत किये गये थे। 
लल्लाचार्य द्वारा रचित ग्रंथ शिष्यधीवृद्धि ई.स. 700 के अध्याय 8 के श्लोक 1 के अनुसार खगोलीय कालगणना का अचूक यंत्र, तैयार करने की विधि दी गई है। इस विधि अनुसार रसायनशास्त्र विभाग के विद्यार्थियों द्वारा यंत्र तैयार किया गया एवं आमंत्रितों के समक्ष कालगणना का सटीक प्रदर्शन किया गया। 
    ईसवीं सन् 400-1300 के प्रसिद्ध संस्कृत ग्रंथ सूर्यसिद्धांत, अध्यास 13 के श्लोक क्रमांक 22 में न्यूनतम व्यय में वायुमंडल की आर्द्रत मापकर  आगामी मौसमा का आंकलन व भविष्यवाणी का वर्णन दृष्टिगोचर होता है जिसके द्वारा कृषि जगत को स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने में सहयोग प्राप्त हो सकता है।
आगामी योजना:-
    रसायन शास्त्र विषय में विद्यार्थियों की अभिरूची अध्ययन-अध्यापन की कौशल विकास विषय के माध्यम से एवं आजीका के विकल्पों को प्रदान करने की लिए एवं प्राचीन भारतीय रसायन विज्ञान के अन्वेषणों पर वर्तमान परिपेक्ष में अनुसंधान कार्य करने के उद्देश्य से निम्न प्रकार की योजनाएँ विचारार्थ हैः-
(अ)    नवीन पाठ्यक्रम -
    1. खाद्य पदार्थो का रासायनिक परीक्षण (21 दिवसीय प्रशिक्षण)
    2. प्रदूषण जांच नियंत्रण निगरानी एवं जागरूकता-प्रशिक्षण पाठ्यक्रम (तीन माह)।
    3. सरल रासायनिक परीक्षण- (तीन माह)।
    4. वैश्लेषिक रसायन- (छः माह)।
(ब)    शोध केन्द्र - 
    1. परंपरागत तकनीकी शोध एवं विकास केंद्र की स्थापना - 
    विभिन्न कारणों से भारतय जीवन शैली एवं संस्कृति के अनुसार सतत् विकास हेतु जागरुकता के निर्माण की आवश्यकता है। मौलिक तथा नवप्रवर्तक विचारों तथा विषयों के अभाव के कारण विज्ञान एवं तकनीकी क्षेत्र में शोध एवं विकास कार्यों में एक प्रकार की निष्क्रियता आ गयी है। संस्कृत साहित्य एवं पारंपरिक अनुभाव, शोध एवं विकास कार्यों एवे विषयों के अध्ययन हेतु संभवतः कुछ अति महत्वपूर्ण विषयों का ज्ञान करा सकता है।
     यह देखा गया है कि पूर्व में धारणीय जीवनशैली, सांस्कृतिक एवं सामाजिक कल्याण हेतु ज्ञान की उत्पत्ति एवं प्रसारण की महत्वपूर्ण अनिवार्य परंपरा इस देश के सभी भागों में थी जो कि पिछले दो सौ वर्षों में विभिन्न कारणों से नष्ट हो गई।
    इन संदर्भों में यह माना जाता है कि शैक्षणिक संस्थाएं एवं विश्वविद्यालय एवं विलक्षण भूमिका निभा सकेंगे। परंपरागत तकनीकी शोध एवं विकास केन्द्र की स्थापना इस दिशा में विश्वविद्यालय का एक अनुपम प्रयास निर्णित होगा।

रसायन शास्‍त्र विभाग में कार्यरत शिक्षक- डाॅ. संजय प्रभुणे

     डाॅ. संजय प्रभुणे मूल निवासी इंदौर मध्यप्रदेश के होकर इन्होंने अपना संपूर्ण शिक्षण इंदौर शहर की विभिन्न शैक्षणिक संस्थााओं से प्राप्त किया। इन्होंने अपना शोध कार्य देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर से ‘‘क्वाटिटेटिव एस्टीमेशन आफ एन्वायरमेंटली टाॅक्सिक केमिकल्सः ए एस्टडी आन इमिशन बाय आटोमोबाईल्स‘‘ विषय पर किया। इन्होंने शैक्षणिक संस्था’’ केशव विद्यापीठ’’ इंदौर में शैक्षणिक प्रबंधक के रूप में अपनी सेवाए प्रदान की तत्पश्चात भारत सरकार के उपक्रम भारतीय कृत्रिम अंग निर्माण निगम, कानपुर में नोडल अधिकारी के रूप में कार्य किया माता जीजाबाई शासकीय स्नातकोत्तर कन्या महाविद्यालय, मोती-तबेला, इंदौर में रसायन शास्त्र विषय का अध्यापन कार्य किया व वर्तमान में अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय भोपाल में रसायन शास्त्र विभाग में कार्यरत है। 
    समय-समय पर आयोजित होने वाली विभिन्न कार्यशालाओं, संगोष्ठी व सम्मलेन में सक्रिय रूप से सहभागी होते है। विभिन्न राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय इनके शोध-पत्र पत्रिकाओं में शोध पत्रों का प्रकाशन हुआ है।
    इसके अतिरिक्त विभिन्न शैक्षणिक व सामाजिक संस्थााअें में सक्रिय भागीदारी होती है। 

रसायन शास्‍त्र विभाग में कार्यरत शिक्षक- श्री अंकित गावशिंदे
    श्री अंकित गावशिंदे मूल निवासी खरगोन के होकर इन्होंने अपना उच्च शिक्षण इंदौर नगर के ख्यातिमान संस्थान से किया है। वर्तमान में इनका शोध कार्य बरक्तउल्लाह विश्वविद्यालय भोपाल से ‘‘एक्टीवेटेड कार्बन‘‘ विषय पर प्रगति पर हैै। 
    इन्होंने विभिन्न तकनीकी संस्थानों में शैक्षणिक कार्य संपादन किया जिसमें पोलिटेक्निक महाविद्यालय, खरगोन, राजीव गांधी प्रौद्योगिकी वि.वि. भोपाल सम्मिलित है। वर्तमान में अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी वि.वि. भोपाल के रसायन शास्त्र विभाग में कार्यरत है। 
    समय-समय पर आयोजित होने वाली वैचारिक, शैक्षणिक व राष्ट्रीय विचार धारा की संगोष्ठियों, सम्मलेनों में संक्रिय रूप से सहभागी रहते है। 
    विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से समाज कार्य के प्रति रूची रखते है। 

 

शिक्षक गण :

विभागीय शिक्षक गण की सूची :
नाम पदनाम विशेषज्ञता संपर्क न. ईमेल
श्री अंकित गावशिंदे अतिथि शिक्षक 8839297703
डॉ. संजय प्रभुुुुणे अतिथि शिक्षक 9425061814

पाठ्यक्रम विवरण:

पाठ्यक्रम का नाम : एम.एस.सी. रसायन शास्त्र
पाठ्यक्रम का प्रकार स्नातकोत्तर
अवधि 2 वर्ष
न्यूनतम योग्यता स्नातक (सम्बंधित विषय में )
अनिवार्य विषय --
उपलब्ध सीट --
प्रवेश का माध्यम प्रावीण सूची
अध्ययन का माध्यम नियमित




पाठ्यक्रम :

पाठ्य विवरण (सिलेबस):
पाठ्यक्रम सिलेबस
एम.एससी. Download
बी.एससी. Download
एम.एससी. Download



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